*ओशो गजब का ज्ञान दे गये कोरोना जैसी महामारी के लिये...*

by - April 21, 2020

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70 के दशक में जब हैजा महामारी के रूप में पूरे विश्व में फैला तब अमेरिका में किसी ने ओशो से प्रश्न किया कि इस महामारी से कैसे बचें ?

ओशो : आप प्रश्न ही गलत पूछ रहे हैं, प्रश्न ये होना चाहिये कि महामारी के कारण लोगों के मन में जो मरने का डर बैठ गया है उस डर से कैसे बचा जाये, क्योंकि वायरस से बचना तो बहुत आसान है, लेकिन जो डर दुनिया के लोगों में बैठ गया है, उससे बचना बहुत ही मुश्किल है !

लोग इस महामारी से कम और डर के कारण ज्यादा मरेंगे, डर से ज्यादा खतरनाक इस दुनिया में कोई वायरस नहीं है ! इस डर को समझिये, अन्यथा मौत से पहले ही आप एक जिंदा लाश बन जायेंगे, जो भयावह माहौल आप अभी देख रहे हैं, इसका वायरस से कोई लेना देना नहीं है !

यह एक सामूहिक पागलपन है, जो एक अन्तराल के बाद हमेशा घटता रहता है, कारण बदलते रहते हैं, कभी सरकारों की प्रतिस्पर्धा, कभी कच्चे तेल की कीमतें, कभी दो देशों की लड़ाई तो कभी जैविक हथियारों की टेस्टिंग !

 इस तरह का सामूहिक पागलपन समय समय पर प्रगट होता रहता है, व्यक्तिगत पागलपन की तरह, कौमगत, राज्यगत, देशगत और वैश्वीक पागलपन भी होता है, इसमें बहुत से लोग या तो हमेशा के लिए विक्षिप्त हो जाते हैं या फिर मर जाते हैं, ऎसा पहले भी हजारों बार हुआ है और आगे भी होता रहेगा, आने वाले बरसों में युद्ध तोपों से नहीं बल्कि जैविक हथियारों से लड़े जायेंगे !

हर समस्या मूर्ख के लिए डर, जबकि ज्ञानी और विद्वानों के लिए अवसर ! इस महामारी में आप घर बैठिये, पुस्तकें पढिये, एक्सरसाइज कीजिये, शरीर को कष्ट दीजिये, व्यायाम कीजिये, फिल्में देखिये, योग कीजिये एक माह में 15 किलो वजन घटाइये, चेहरे  पर बच्चों जैसी ताजगी लाइये, इस महामन्दी में पैसा इन्वेस्ट कीजिये, ये अवसर है जो बीस तीस साल में एक बार आता है, पैसा बनाने की सोचिये, कहां बीमारी की बात करतें हैं !

ये भय और भीड़ का मनोविज्ञान सबके समझ नहीं आता हैं, अगर डरने में मजा नहीं आता तो लोग भूतहा फिल्म देखने क्यों जाते, ये एक सामूहिक पागलपन है जो अखबारों और TV के माध्यम से भीड़ को बेचा जा रहा है, लेकिन सामूहिक पागलपन के क्षण में आपकी मालकियत छिन सकती हैं, आप महामारी से डरते हैं तो आप भी भीड़ का ही हिस्सा हैं !

ओशो-कहते हैं TVपर खबरें सुनना और अखबार पढ़ना बंद करें, ऎसा कोई भी वीडियो या न्यूज़ मत देखिये जिससे आपके भीतर डर पैदा हो, महामारी के बारे में बात करना बंद कर दीजिये, डर भी एक तरह का आत्म सम्मोहन ही है, एक ही तरह के विचार को बार-बार घोकने से शरीर के भीतर रासायनिक बदलाव होने लगता है , जो कभी कभी इतना जहरीला हो सकता है कि आपकी जान भी ले ले !

महामारी के अलावा भी बहुत कुछ दुनिया में हो रहा है, उन पर ध्यान दीजिये, ध्यान साधना से साधक के चारों तरफ एक प्रोटेक्टिव Aura बन जाता है, जो बाहर की नकारात्मक उर्जा को भीतर प्रवेश नहीं करने देता है, अभी पूरी दुनिया की उर्जा नाकारात्मक हो चुकी है, ऎसे में आप कभी भी इस ब्लैक होल में गिर सकते  हैं, ध्यान की नाव में बैठकर ही आप इस झंझावात से बच सकते हैं ! शास्त्रों का अध्यन कीजिये, साधू संगत कीजिये, विद्वानों से सीखें !

*आहार का भी विशेष ध्यान रखिये, स्वच्छ जल पियें, अंतिम बात : धीरज रखिये, जल्द ही सब कुछ बदल जायेगा, जब तक मौत न आ जाये, तब तक उससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है और जो अपरिहार्य है उससे डरने का कोई अर्थ भी नहीं है ! डर एक प्रकार की मूढ़ता है, अगर किसी महामारी से अभी नहीं भी मरे तो भी एक न एक दिन मरना ही होगा और वो एक दिन कोई भी दिन हो सकता है, इसीलिये विद्वानों की तरह जियें भीड़ की तरह नहीं...!!*

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